ShivPuraan in hindi kathaa chepter 7 (श्रीशिवमहापुराण- सातवाँ अध्याय: शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास)), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सातवाँ अध्याय

शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास) : पृष्ठ 2


महानलस्तंभविभीषणाकृतिर्बभूव तन्मध्यतले स निष्कलः।।११।।
ते अस्त्रे चापि सज्वाले लोकसंहरणक्षमे।
निपतेतुः क्षणे नैव ह्याविर्भूते महानले।।१२।।
तब उन दोनों के मध्य एक प्रचण्ड निष्कल (निराकार) अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ। जिसमें तिनों लोको को भस्म कर देने जैसी ज्वालाएं निकल रही थी। उस अग्नि-स्तंभ को देखकर दोनो (ब्रह्मा-वीष्णु) अपने आपसी युद्ध को भुल गये।
दृष्ट्वा तदद्भुतं चित्रमस्त्रशांतिकरं शुभम्।
किमेतदद्भुताकारमित्यूचुश्च परस्परम्।।१३।।
अतींद्रियमिदं स्तंभमग्निरूपं किमुत्थितम्।
अस्योर्ध्वमपि चाधश्चावयोर्लक्ष्यमेव हि।।१४।।
चारो ओर शांति व्यापत हो गयी, तथा वे विचार करने लगे कि यह अद्भुत आकार कि वस्तु क्या है? यह अग्नि-स्तंभ कहाँ से प्रकट हुआ है?
इति व्यवसितौ वीरौ मिलितौ वीरमानिनौ।
तत्परौ तत्परीक्षार्थं प्रतस्थाते ऽथ सत्वरम्।।१५।।
आवयोर्मिश्रयोस्तत्र कार्यमेकं न संभवेत्।
इत्युक्त्वा सूकरतनुर्विष्णुस्तस्यादिमीयिवान्।।१६।।
तथा ब्रह्माहं सतनुस्तदंतं वीक्षितुं ययौ।
भित्त्वा पातालनिलयं गत्वा दूरतरं हरिः।।१७।।
आपस मे ऐसा विचार करके दोनो ने उस अग्नि-स्तंभ कि वास्तविकता कि परख के लिये युक्ति सोची तब विष्णुजी सुकर का रुप लेकर निचे कि ओर उस अग्नि-स्तंभ कि गहराई की थाह लेने के लिये गये तथा ब्रह्माजी हंस का रुप लेकर उस अग्नि-स्तंभ कि ऊँचाई का पता लगाने के लिये चले। भगवान विष्णु पाताल मे बहुत भीतर तक चले गये।
ना ऽपि श्यात्तस्य संस्थानं स्तंभस्यानलवर्चसः।
श्रांतः स सूकरहरीः प्राप पूर्वं रणांगणम्।।१८।।
परन्तु उन्हे उसकी थाह न मिली तब वे हार कर वापस पुनः उसी स्थान पर लौट आये जहाँ से वे चले थे।
अथ गच्छंस्तु व्योम्ना च विधिस्तात पिता तव।
ददर्श केतकी पुष्पं किंचिद्विच्युतमद्भुतम्।।१९।।
ब्रह्माजी को आकाश मे ऊपर जाते हुए रास्ते मे एक केतकी (मल्लिका) का सुन्दर फुल दिखाई पड़ा। ब्रह्माजी ने कहा तुम बहुत सुन्दर हो, तुम यहाँ क्या कर रहे हो।
अतिसौरभ्यमम्लानं बहुवर्षच्युतं तथा।
अन्वीक्ष्य च तयोः कृत्यं भगवान्परमेश्वरः।।२०।।
केतकी ने कहा मे प्रार्थना करने के लिये यहाँ आया था, तभी हवा मे हुए विस्फोट ने मुझे आकाश मे बहुत ऊपर तह उड़ा दिया, कई वर्षो से मै यहीं हुँ।
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