ShivPuraan in hindi kathaa chepter 7 (श्रीशिवमहापुराण- सातवाँ अध्याय: शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास)), page:3
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सातवाँ अध्याय

शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास) : पृष्ठ 3


परिहासं तु कृतवान्कंपनाच्चलितं शिरः।
तस्मात्तावनुगृह्णातुं च्युतं केतकमुत्तमम्।।२१।।
तब ब्रह्माजी बल-पुर्वक हंसे और कहा, तुम मेरे साथ चलो।
किं त्वं पतसि पुष्पेश पुष्पराट्केन वा धृतम्।
आदिमस्याप्रमेयस्य स्तंभमध्याच्च्युतश्चिरम्।।२२।।
न संपश्यामि तस्मात्त्वं जह्याशामंतदर्शने।
अस्यां तस्य च सेवार्थं हंसमूर्तिरिहागतः।।२३।।
विष्णु और मेरे बीच शर्त लगी थी कि हम दोनो मे कौन बड़ा है, तब यह स्तंभ हमारे बीच मे आया था। तब हम इसके आदि तथा अंत का पता लगाने कि शर्त लगी जो पहले पता करेगा वह वीजयी होगा।
इतः परं सखे मे ऽद्य त्वया कर्तव्यमीप्सितम्।
मया सह त्वया वाच्यमेतद्विष्णोश्च सन्निधौ।।२४।।
स्तंभांतो वीक्षितो धात्रा तत्र साक्ष्यहमच्युत।
इत्युक्त्वा केतकं तत्र प्रणनाम पुनः नः।
असत्यमपि शस्तं स्यादापदीत्यनुशासनम्।।२५।।
मैं इस स्तंभ की ऊँचाई पता लगाने ऊपर आया, वह स्तंभ की गहराई पता लगाने निचे है। तुम मेरे साथ चलो, तुम कह देना कि मे तुम्हे स्तंभ के शीर्ष से लाया हुँ। तब पुष्प ने धिरे से हाँ मे सिर हिलाया।
समीक्ष्य तत्राऽच्युतमायतश्रमं प्रनष्टहर्षं तु ननर्त हर्षात्।
उवाच चैनं परमार्थमच्युतं षंढात्तवादः स विधिस्ततो ऽच्युतम्।।२६।।
तब हंसरुपी ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न हो उसे अपनी चोंच मे दबाकर चल दिये।
स्तंभाग्रमेतत्समुदीक्षितं हरे तत्रैव साक्षी ननु केतकं त्विदम्।
ततो ऽवदत्तत्र हि केतकं मृषा तथेति तद्धातृवचस्तदंतिके।।२७।।
हे हरि मुझे यह केतकी का पुष्प इस अग्नि-स्तंभ के प्रारम्भ मे मिला है यह इसका साक्षी है। तब केतकी पुष्प ने भी कुछ ना कहते हुए, धीरे से हाँ मे सिर हिलाया।
हरिश्च तत्सत्यमितीव चिंतयंश्चकार तस्मै विधये नमः स्वयम्।
षोडशैरुपचारैश्च पूजयामास तं विधिम्।।२८।।
तब विष्णुजी निराश होकर बोले "ठिक है आप विजयी हुए, मै इस स्तंभ कि गहराई पता लगाने मे असमर्थ रहा, आप सर्वश्रेष्ठ व पुजनीय है।"
विधिं प्रहर्तुं शठमग्निलिंगतः स ईश्वरस्तत्र बभूव साकृतिः।
समुत्थितः स्वामि विलोकनात्पुनः प्रकंपपाणिः परिगृह्य तत्पदम्।।२९।।
आद्यंतहीनवपुषि त्वयि मोहबुद्ध्या भूयाद्विमर्श इह नावति कामनोत्थः।
स त्वं प्रसीद करुणाकर कश्मलं नौ मृष्टं क्षमस्व विहितं भवतैव केल्या।।३०।।
तब उस स्तंभ मे से भयंकर अग्नि कि लपटे निकलने लगी और भगवान शंकर साकार रुप मे प्रकट हुए।
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