ShivPuraan in hindi kathaa chepter 7 (श्रीशिवमहापुराण- सातवाँ अध्याय: शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास)), page:4
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: सातवाँ अध्याय

शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास) : पृष्ठ 4


ईश्वर उवाच :
वत्सप्रसन्नो ऽस्मि हरे यतस्त्वमीशत्वमिच्छन्नपि सत्यवाक्यम्।
ब्रूयास्ततस्ते भविता जनेषु साम्यं मया सत्कृतिरप्यलप्थाः।।३१।।
शिवजी ने कहा— वत्स् हरी मे तुम से अत्यधिक प्रसन्न हुँ। तुमने सत्य कहा, यह मेरा आत्म-रुप शिवलिंग है ईसका ना आदि है न ही अंत।
इतः परं ते पृथगात्मनश्च क्षेत्रप्रतिष्ठोत्सवपूजनं च।।३२।।
अत: तुम्हारी हर क्षेत्र मे प्रतिष्ठान उत्सव मे पुजा होगी।
इति देवः पुरा प्रीतः सत्येन हरये परम्।
ददौ स्वसाम्यमत्यर्थं देवसंघे च पश्यति।।३३।।
तुम सभी देवताओ के पुजनीय होगे।
।। इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायां सप्तमो ऽध्यायः ।।

॥ श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास)" नामक यह सातवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ ॥

आठवाँ अध्याय: शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (भैरवजी द्वारा ब्रह्माजी का पाँचवा सिर काटना एवं केतकी पुष्प को शिवजी का शाप)
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