ShivPuraan in hindi kathaa chepter 8 (श्रीशिवमहापुराण- आठवाँ अध्याय: शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (भैरवजी द्वारा ब्रह्माजी का पाँचवा सिर काटना एवं केतकी पुष्प को शिवजी का शाप)), page:2
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: आठवाँ अध्याय

शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (भैरवजी द्वारा ब्रह्माजी का पाँचवा सिर काटना एवं केतकी पुष्प को शिवजी का शाप) : पृष्ठ 2


ईश्वर उवाच
अराजभयमेतद्वै जगत्सर्वं न शिष्यति।
ततस्त्वं जहि दंडार्हं वह लोकधुरं शिशो।।१२।।
वरं ददामि ते तत्र गृहाण दुर्लभं परम्।
वैतानिकेषु गृह्येषु यज्ञे च भवान् गुरुः।।१३।।
शिवजी ने कहा— आपके क्षमा प्रार्थना करने व झुठ बोलने कि भुल स्विकार कर लेने से मै आपको सभी देवो का आचार्य घोषीत करता हुँ, परन्तु असत्य बोलने के कारण भविष्य मे किसी भी जगह आपकी पूजा नहीं होगी।
निष्फलस्त्वदृते यज्ञः सांगश्च सहदक्षिणः।
अथाह देवः कितवं केतकं कूटसाक्षिणम्।।१४।।
फिर केतकी के पुष्प जिसने इस झुठ मे ब्रह्माजी का सहयोग किया था, से बोले।
रे रे केतक दुष्टस्त्वं शठ दूरमितो व्रज।
ममापि प्रेम ते पुष्पे मा भूत्पूजास्वितः परम्।।१५।।
इत्युक्ते तत्र देवेन केतकं देवजातयः।
सर्वानि वारयामासुस्तत्पार्श्वादन्यतस्तदा।।१६।।
अरे दुष्ट केतकी असत्य बोलने मे सहयोग देने के कारण भविष्य मे कभी भी मेरी पूजा मे केतकी का उपयोग नहीं किया जायेगा।
केतक उवाच
नमस्ते नाथ मे जन्मनिष्फलं भवदाज्ञया।
सफलं क्रियतां तात क्षम्यतां मम किल्बिषम्।।१७।।
केतकी ने कहा— प्रणाम प्रभू मेरा जन्म निष्फल हो गया, कृपा करके मेरे पाप को क्षमा करके इस सफल किजिये।
ज्ञानाज्ञानकृतं पापं नाशयत्येव ते स्मृतिः।
तादृशे त्वयि दृष्टे मे मिथ्यादोषः कुतो भवेत्।।१८।।
अज्ञान के कारण मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी और मुझ पर यह मिथ्यादोष लगा है।
तथा स्तुतस्तु भगवान्केतकेन सभातले।
न मे त्वद्धारणं योग्यं सत्यवागहमीश्वरः।।१९।।
मदीयास्त्वां धरिष्यंति जन्म ते सफलं ततः।
त्वं वै वितानव्याजेन ममोपरि भविष्यसि।।२०।।
इत्यनुगृह्य भगवान्केतकं विधिमाधवौ।
विरराज सभामध्ये सर्वदेवैरभिष्टुतः।।२१।।
और वह शिवजी कि स्तुति करने लगा, उसकी स्तुती से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे वरदान देते हुए कहा कि 'मंडप आदि कि सजावट मे तुम्हे शिरोमणी फुल के रुप मे प्रयोग किया जावेगा।'
।। इति श्रीशिवमहापुराणे विद्येश्वरसंहितायामष्टमो ऽध्यायः ।।

।। श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता का "शिव लिग्ङ कि उत्तपत्ति कि कथा (ब्रह्मा-वीष्णु के मध्य शिव लिग्ङ का प्रकट होना तथा ब्रह्मा-वीष्णु का शिव लिग्ङ की थाह पाने हेतु प्रयास)" नामक यह सातवाँ अध्याय सम्पुर्ण हुआ ।।

नवाँ अध्याय: महेश्वर का ब्रह्मा और विष्णु को अपने निष्कल और सकल स्वरुप का परिचय देते हुए लिङ्ग पूजन का महत्व बताना
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