ShivPuraan in hindi kathaa chepter 9 (श्रीशिवमहापुराण- नवाँ अध्याय: महेश्वर का ब्रह्मा और विष्णु को अपने निष्कल और सकल स्वरुप का परिचय देते हुए लिग्ड़ पूजन का महत्व बताना), page:1
 
। । ॐ नमः शिवाय । ।

श्रीशिवमहापुराण-विद्येश्वरसंहिता: नवाँ अध्याय

महेश्वर का ब्रह्मा और विष्णु को अपने निष्कल और सकल स्वरुप का परिचय देते हुए लिङ्ग पूजन का महत्व बताना : पृष्ठ 1


नन्दिकेश्वर उवाच
तत्रांतरे तौ च नाथं प्रणम्य विधिमाधवौ।
बद्धांजलिपुटौ तूष्णीं तस्थतुर्दक्षवामगौ।।१।।
नन्दिकेश्वर कहते है — तद्न्तर वे दोनो भगवान शंकर को प्रणाम करके, दोनो हाथ जोड़कर दायें व बायें भाग मे खड़े हो गये।
तत्र संस्थाप्य तौ देवं सकुटुंबं वरासने।
पूजयामासतुः पूज्यं पुण्यैः पुरुषवस्तुभिः।।२।।
फिर उन्होने वहाँ सक्षात् प्रकट पूजनीय महादेवजी को श्रेष्ठ आसन पर स्थापित करके पवित्र वस्तुओं द्वारा उनका पुजन किया।
पौरुषं प्राकृतं वस्तुज्ञेयं दीर्घाल्पकालिकम्।
हारनूपुरकेयूरकिरीटमणिकुंडलैः।।३।।
दिर्घकाल तक अविकृत-भाव से सुस्थिर रहने वाली वस्तुओं को 'पुरुष-वस्तु' कहते हैं और अल्पकाल तक ही टिकने वाली क्षणभंगुर वस्तुएँ 'प्राकृत-वस्तु' कहलाती है। इस तरह वस्तु के ये दो भेद जानने चाहिये। (किन पुरुष-वस्तुओं से उन्होने भगवान शिव का पूजन किया, यह बताया जाता है-)
यज्ञसूत्रोत्तरीयस्रक्क्षौममाल्यांगुलीयकैः।
पुष्पतांबूलकर्पूरचंदनागुरुलेपनैः।।४।।
धूपदीपसितच्छत्रव्यजनध्वजचामरैः।
अन्यैर्दिव्योपहारैश्च वाङ्मनोतीतवैभवैः।।५।।
पतियोग्यैः पश्वलभ्यैस्तौ समर्चयतां पतिम्।
यद्यच्छ्रेष्ठतमं वस्तु पतियोग्यं हितद्ध्वजे।।६।।
हार, नूपुर, केयुर, किरीट, मणिमय कुण्डल, यज्ञोपवित, उत्तरीय वस्त्र, पुष्प माला, रेशमी वस्त्र, हार, मुद्रीका, पुष्प, ताम्बूल, कपुर, चन्दन एवं अगुरु का अनुलेप, धुप-दिप, श्वेत-क्षत्र, व्यञ्जन, ध्वजा, चँवर तथा अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा, जिनका वैभव वाणी और मन की पहुँच से परे था, जो केवल पशुपति (परमात्मा) के ही योग्य थे और जिन्हे पशु (बद्ध-जिव) कदापि नहीं पा सकते थे, उन दोनों ने अपने स्वामी महेश्वर का पूजन किया। तद्वस्त्वखिलमीशोपि पारं पर्यचिकीर्षया।
सभ्यानां प्रददौ हृष्टः पृथक्तत्र यथाक्रमम्।।७।।
सबसे पहले वहाँ ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान शंकर कि पूजा कि बाद मे सभी देवताओं ने भी उसी विधि से भगवान शंकर का पूजन किया।
कोलाहलो महानासीत्तत्र तद्वस्तु गृह्णताम्।
तत्रैव ब्रह्मविष्णुभ्यां चार्चितः शंकरः पुरा।।८।।
प्रसन्नः प्राह तौ नम्रौ सस्मितं भक्तिवर्धनः।
ईश्वर उवाच
तुष्टो ऽहमद्य वां वत्सौ पूजया ऽस्मिन्महादिने।।९।।
इससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने खड़े हो कर उन दोनो से नम्रता-पुर्वक कहा- महेश्वर बोले — आज का दिन एक महान दिन है, इस दिन तुम्हारे द्वारा जो मेरी पूजा हुई ईससे मै बहुत प्रसन्न हुँ।
दिनमेतत्ततः पुण्यं भविष्यति महत्तरम्।
शिवरात्रिरिति ख्याता तिथिरेषा मम प्रिया।।१०।।
इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान से भी महान होगा। आज कि यह तिथी जगत मे शिवरात्री के नाम से विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी।
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