तुलसी के एक पत्ते में कैसे बिक गए भगवान भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को अपने रूप पर बड़ा ग.....
 
सबसे बड़ा प्रेम
तुलसी के एक पत्ते में कैसे बिक गए भगवान



भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को अपने रूप पर बड़ा गर्व था. उन्हें लगता था कि रूपवती होने के कारण ही श्रीकृष्ण उनसे अधिक स्नेह रखते हैं. एक दिन नारदजी से सत्यभामा ने कहा कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए कि अगले जन्म में भी भगवान श्रीकृष्ण ही मुझे पति रूप में प्राप्त हों.

नारदजी बोले- यदि कोई व्यक्ति अपनी सबसे प्रिय वस्तु इस जन्म में दान करता है, तभी वह वस्तु उसे अगले जन्म में प्राप्त होती है. अतः यदि आप श्रीकृष्ण को मुझे दान स्वरूप दें तो वह अगले जन्म में आपको जरूर मिलेंगे. सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को नारद मुनि को दान कर दिया.

नारदजी अपना दान लेकर जाने लगे तो अन्य रानियों ने उन्हें रोक लिया. नारदजी बोले, ‘यदि श्रीकृष्ण के बराबर रत्न प्रतिदान में दे दो तभी वापस मिल सकते हैं.’

तराजू के एक पलड़े में श्रीकृष्ण बैठे. दूसरे पलड़े में सभी रानियां अपने−अपने आभूषण चढ़ाने लगीं, पर पलड़ा हिला तक नहीं. सत्यभामा ने कहा, यदि मैंने इन्हें दान किया है तो मैं, उबार भी लूंगी. उन्होंने अपने सारे आभूषण चढ़ा दिए, पर पलड़ा नहीं हिला.
सारा हाल जब श्रीकृष्णजी की पटरानी रुक्मिणीजी ने सुना तो वह तुलसी पूजन करके उसकी पत्ती ले आईं. उस पत्ती को पलड़े पर रखते ही तुला का वजन बराबर हो गया. नारद तुलसी दल लेकर चले गए. तुलसी के प्रभाव से ही वह अपने व अन्य रानियों के सौभाग्य की रक्षा कर सकीं. रानियों ने रुक्मिणी से इसका कारण पूछा.

रूक्मिणी बोली- हम सब ने श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए तरह-तरह के यत्न किए तब हमारी मनोकामना पूरी हुई. यह हमारा सौभाग्य था किंतु तुलसी ने ऐसी कामना कभी नहीं रखी. श्रीहरि ने तुलसी को स्वयं अपनी वल्लभा (प्रेयसी) के रूप में स्वीकार किया.

प्रभु की दृष्टि में सबसे बड़ा प्रेम वह है जो निष्काम हो. इसलिए पादप(पौधा) रूपी देवी तुलसी का स्थान प्रभु की दृष्टि में हमसे श्रेष्ठ है. सत्यभामा का रूप का गर्व चूर हुआ.Posted at 23 Apr 2020 by admin
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