महात्मा तिरुवल्लुवर कपड़े बुनकर अपनी आजीविका चलाते थे। एक दिन संध्या के समय उनके पास एक उद्दंड .....
 
क्षमा और प्रेम
महात्मा तिरुवल्लुवर कपड़े बुनकर अपनी आजीविका चलाते थे।

एक दिन संध्या के समय उनके पास एक उद्दंड युवक आया और एक कपड़े का दाम पूछने लगा।

संत ने बताया-बीस रुपये।

युवक ने उस कपड़े के दो टुकड़े कर दिये और फिर उनका मूल्य पूछा।

संत ने कहा- दस-दस रुपये।

इस पर युवक ने उन दुकड़ों के भी टुकड़े कर दिये और बोला- अब?

संत ने उसी गंभीरता से कहा- पाँच रुपये प्रत्येक।

इस पर वह युवक उन टुकड़ों के टुकड़े करता गया और संत धैर्य पूर्वक उनका मूल्य बताते रहे।

युवक संभवतः उन्हें क्रोधित करने के लिए संकल्पित था। अंत में युवक ने तार-तार किए हुए उस कपड़े को गेंद की तरह लपेटा और कहा- अब?

तिरुवल्लुर ने कहा बेटा! तुम इसे निशुल्क ले जा सकते हो!

इतने पर भी संत का इतना धीर-गंभीर उत्तर सुनकर युवक का हृदय पश्चाताप से भर गया और वह उनके सम्मुख नतमस्तक हो गया।

वस्तुतः व्यक्ति दंड द्वारा उतना नहीं सीखता, जितना क्षमा और प्रेम द्वारा सीखता है।Posted at 23 Apr 2020 by admin
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