बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत परबासमती चाव.....
 
जैसा अन्न वैसा मन
बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत परबासमती चावल मिलने लगा।सेठ को हुआ कि इतना पाप हो रहा हैतो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।

एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन प्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय था। सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए। थोड़ी धूप कम हो जायफिर पधारियेगा।"साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली।

सेठ ने 100-100 रूपये वाली10 लाख जितनी रकम कीगड्डियाँ उसी कमरे मेंचादर से ढँककर रख दी।साधु बाबा आराम करने लगे।खीर थोड़ी हजम हुई। चोरी के चावल थे। साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं,एक-दो उठाकर झोले में रख लूँतो किसको पता चलेगा ? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली।

शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठातो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तोभगवत्पुरुष थे, वे क्यों लेंगे ?नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी।ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।इतने में साधु बाबा आ पहुँचेतथा अपने झोले में से गड्डीनिकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः"नौकरों को मत पीटना,गड्डी मैं ले गया था।"

सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों सेपूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगाऔर आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से हीवापस करने आये हैंक्योंकि साधु तो दयालु होते हैं।"साधुः "यह दयालुता नहीं है।मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डीचुराकर ले गया था। सेठ ! तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किस की और किसलिए बनायी थी ?"सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ,उसी चावल की खीर थी।

साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थीइसलिए उसने मेरे मन में भीचोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गयातब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि'हे राम.... यह क्या हो गया ?मेरे कारण बेचारे नौकरों परन जाने क्या बीत रही होगी।इसलिए तेरे पैसेलौटाने आ गया।"

इसीलिए कहते हैं किःजैसा खाओ अन्नवैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी वैसी होवे वाणी।। Posted at 23 Apr 2020 by admin
FACEBOOK COMMENTES
  Share it --