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श्री कृष्ण जन्मोत्सव (जन्माष्टमी) विषेश
।।वासुं करोति इति वासुः।।
जो सब में बस रहा हो, वास कर रह हो उस सच्चिदानंद परमात्मा का नाम है 'वासुदेव'।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी भगवान वासुदेव का प्राकट्य महोत्सव है। भगवान वासुदेव अट्ठासवीं चतुर्युगी के द्वापर युग में प्रकट हुए हैं। वे अजन्मा हैं, अच्युत हैं, अकाल हैं, काल की सीमा में नहीं आते, वे काल के भी काल हैं। अखूट ऐश्वर्य, अनुपम माधुर्य और असीम प्रेम से परिपूर्ण हैं भगवान वासुदेव।
वे तो लीलावतार हैं, पूर्णावतार हैं, माधुर्य अवतार हैं, ऐश्वर्य अवतार हैं, प्रेमावतार हैं।
भगवान का माधुर्य, ऐश्वर्य, प्रेमयुक्त वर्णन *कृष्णावतार* में ही पाया जाता है।
*रामावतार* में दास्य भक्ति की बात है परंतु *कृष्णावतार* में साख्य भक्ति की बात है।
श्रीकृष्ण को या तो सखा दिखता है या वात्सल्य बरसाने वाली माँ दिखती है या अपने *मित्र-प्रेमी, ग्वाल-गोपियाँ* दिखते हैं।
रोहिणी नक्षत्र में, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कंस के जेल में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ है। कृष्ण पक्ष है, अँधेरी रात है, अँधेरी रात को ही उस प्रकाश की आवश्यकता है।
वर्णन आया है कि जब भगवान अवतरित हुए तब जेल के दरवाजे खुल गये, पहरेदारों को नींद आ गयी, रोकने-टोकने और विघ्न डालने वाले सब निद्राधीन हो गये। जन्म हुआ है जेल में, एकान्त में, वसुदेव-देवकी जी के यहाँ और *लालन-पालन* होता है नंद-यशोदा के यहाँ। ब्रह्मसुख का प्राकट्य एक जगह पर होता है और उसका पोषण दूसरी जगह पर होता है। श्रीकृष्ण का प्राकट्य देवकी जी के यहाँ हुआ है परंतु पोषण यशोदा माँ के वहाँ होता है। अर्थात् जब *श्रीकृष्ण-जन्म* होता है, उस आत्मसुख का प्राकट्य होता है तब इन्द्रियाँ और मन ये सब सो जाने चाहिए, शांत हो जाने चाहिए। जब इन्द्रियाँ और मन शांत हो जाते हैं तब बंधन के दरवाजे खुल जाते है, 'मैं' और 'मेरे' की भावनाएँ खत्म हो जाती हैं। जब इन्द्रियाँ सतर्क होती हैं, मन चंचल होता है तब मैं और मेरा बनता है, जब इन्द्रियाँ शांत हो जाती हैं, मन विश्रांति पाता है, तब मैं और मेरा नहीं रहता।
भगवान का प्राकट्य हुआ है, वसुदेव जी भगवान को उठाकर लिये जा रहे हैं, यशोदा जी के घर। आनंद का प्राकट्य और आनंद के पोषण के बीच, आनंद को देखकर आनंदित होने वाली यमुना जी की कथा आती है।
यमुना जी सोचती हैं कि वे आनंदस्वरूप अकाल पुरूष आज साकार ब्रह्म होकर आये हैं। मैं उनके चरण छूने के लिए बढ़ूँ तो सही परंतु वसुदेव जी डूब गये तो? वसुदेव जी डूब जायेंगे तो मुझ पर कलंक लगेगा कि आनंद को उठाये लिये जाने वाले को कैसे डुबाया? अगर ऊपर नहीं बढ़ती हूँ तो चरण-स्पर्श कैसे हो ? यमुनाजी कभी तरंगित होती हैं तो कभी नीचे उतरती हैं, वसुदेव जी को लगता है कि अभी डूबे-अभी डूबे। परंतु यमुना जी को अपनी इज्जत का, अपने प्रेमावतार परमात्मा का भी ख्याल है। बाढ़ का पानी वसुदेव जी को डुबाने में असमर्थ है, यह कैसा आश्चर्य है? उसे बाढ़ का पानी कहो या यमुना जी के प्रेम की बाढ़ कहो, उसने वसुदेव जी को डुबोया नहीं, और वसुदेव जी के सिर पर जो आनंदकंद सच्चिदानंद है उसके चरण छुए बिना चुप भी नहीं रहती। यमुना जी उछलती है, फिर सँभलती है।
आनंदस्वरूप श्रीकृष्ण समझ गये कि यमुना उछलकूद क्यों मचाती है। वसुदेव जी को डुबाने से तो डरती है और मेरे चरण छुए बिना चुप भी नहीं रहती। तब उस नंदनंदन ने अपना पैर पसारा है, यमुना जी को आह्लाद हुआ और यमुना जी तृप्त हुई हैं। मेरे कृष्ण आ रहे है।।

संतों का कहना है, महापुरूषों का यह अनुभव है कि निर्विकारी समाधि में आनंद का प्राकट्य हो सकता है परंतु आनंदस्वरूप प्रभु का पोषण तो प्रेमाभक्ति के सिवाय कहीं नहीं हो सकता। योगी कहता है कि समाधि में था, बड़ा आनंद था, बड़ा सुख था, भगवन्मस्ती थी, मगर समाधि चली गयी तो अब आनंद का पोषण कैसे हो, आनंद का पोषण बिना रस के नहीं होता।
वसुदेव-देवकी जी ने तो आनंद-स्वरूप श्रीकृष्ण को प्रकट किया किंतु उसका पोषण होता है नंद-यशोदा जी के घर। वसुदेव जी उन्हें नंद जी के घर ले गये है, यशोदा जी सो रही है, यशोदा जी के पालने में कन्या का अवतरण हुआ है। जहाँ प्रेम है, विश्रांति है वहाँ शांति का प्राकट्य होता है, जहाँ समाधि है वहाँ आनंद का प्राकट्य होता है। वसुदेव जी आनंदकंद कृष्ण कन्हैया को यशोदा जी के पास छोड़ते हैं और शक्ति स्वरूपा कन्या को ले आते हैं और उसे जेल में देवकी जी के पास रख देते हैं।

।।श्रीकृष्णा गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा।। Posted at 15 Nov 2018 by admin
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