एक वृद्धा जो कि फल बेचकर अपना गुजारा करती थी और प्रभू भक्ति मे लिन रहती थी। परन्तु वह मन से खुश नह.....
 
प्रभु के रिश्तेदार
एक वृद्धा जो कि फल बेचकर अपना गुजारा करती थी और प्रभू भक्ति मे लिन रहती थी। परन्तु वह मन से खुश नहीं थी क्योकि कभी कभी फल ना बीकने के कारण उसे तंगी का भी सामना करना पड़ता था। इसलिये वह हमेशा सोचा करती कि मुझे भक्ति का उचित फल नहीं मिल रहा है। अतेव प्रभु भक्ति मे रमे होने पर भी वह मन से दुःखी थी।
एक बार उसके गाँव मे एक संत आये वे सतसंग मे आये भक्तों के प्रश्नों का भी समाधान कर रहे थे। जब उस वृद्धा ने यह सुना तो वह तुरन्त सतसंग मे गयी और अपना प्रश्न उन संत के समक्ष सुनाया, कि मैं हमेशा प्रभू कि भक्ति करती हुँ फिर भी मेरा जिवन सुखमय क्यों नहीं है, बाकी कभी हमेशा खुश रहते है।

संत मुस्कुराते हुए बोले- माई तुम फल बेचती हो।

वृद्धा बोली- हाँ, यही मेरी जीविका है, इसी से मेरे घर का गुजर-बसर होता है।

संत बोले- तो क्या तुम सभी को एक समान व एक ही दाम मे फल देती हो, मतलब अपने रिश्तेदारो तथा खास लोगो को भी वैसे ही दाम मे फल बेचती हो जैसे ओरो को।

वृद्धा बोली- नहीं! भला अपने रिश्तेदारो और सगे-संबन्धीयों से भी कोई व्यापार करता है, बल्की मैं तो उन्हे अच्छे मिठे फल छाँटकर देती हुँ और जो नहीं बीकने वाले थोड़े खट्टे फल होते है वो भी उन्हीं को दे आती हुँ तथा कोई पैसे भी नहीं लेती।

संत गंभीर वाणी मे बोले- बस भगवान भी यही तो करते है, जिन भक्तों से वे खास स्नेह रखते है उन्हे वे पहले खट्टे फल खाने को देते है और अच्छे मिठे फल छाँटकर रखते है जो कि वे उचित समय आने पर दे देते है, जिसका वे कोई मोल भी नहीं लेते। बस हमे धीरज रख उस उचित समय की प्रतिक्षा करना है।

अब वृद्धा पुर्ण संतुष्ट थी व खुश थी क्योकि की वह खुद को भगवान का प्रिय भक्त जानकर मन से प्रसन्न थी

अगर आपको भी बार-बार कोई कष्ट हो तो समझियेगा की आप भी भगवान के प्रिय भक्त है, और उन्होने आपके लिये भी कुछ अच्छे मिठे वाले फल छाँटकर अलग रखे हुए है, जो वे उचित समय आने पर आपको देंगे।

॥ जय सियाराम ॥ Posted at 23 Apr 2020 by admin
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