ऋतु आने पर बन्दर और बन्दरियों के जोड़े यत्र-तत्र जंगल में आमोद-प्रमोदरत रहते; किन्तु यह बन्दर उन .....
 
ब्रह्मचारी बन्दर
ऋतु आने पर बन्दर और बन्दरियों के जोड़े यत्र-तत्र जंगल में आमोद-प्रमोदरत रहते; किन्तु यह बन्दर उन सबसे अलग-थलग आश्रम के सामने एक वृक्ष पर बैठा रहता था। बड़े सवेरे ही वह बन्दर पहाड़ से उतरकर महाराजजी के सामने खम्भे के पास बैठ जाता था। महाराजजी उस समय ध्यान में बैठे रहते थे। वह भी आँखे बन्द करके हाथ समेटकर बैठ जाता था। बन्दर बड़े चंचल होते हैं, किन्तु वह एक आसन से बैठा रहता था। उसका रोआँ तक न हिलता। थोड़ी-थोड़ी देर में आधी आँख उठाकर वह देख लेता कि महाराजजी बैठे है या नहीं। जब महाराजजी चिमटे से धूनी खोदने लगते तब वह भी इधर-उधर देखने लगता। महाराजजी उसे प्रोत्साहन देते, "ठीक है बेटा! भजन में इसी तरह लगे रहो।" महाराजजी उस बन्दर के भजन से बड़े खुश होते थे। वे उसके लिए आटे में चोकर मिलाकर एक मोटा टिक्कड़ तैयार कराते और भजन से उठने के पश्चात उसे वही टिक्कड़ देते थे। वह खड़ा होकर एक हाथ से टिक्कड़ लेता और तीन पैरों से चलकर पहाड़ पर चढ़ जाता था। वहाँ बैठकर वह रोटी खाता और प्रातःकाल पुनः महाराजजी की सेवा में उपस्थित हो जाता था। एक दिन महाराजजी उस बन्दर पर अप्रसन्न हो गये, "हम तुम्हारे नौकर हैं क्या, जो दस मील सिर पर लादकर आटा मँगावे और तुझे खिलावें? जब ब्रह्मचारी बने हो, साधु हो तो अपना प्रबन्ध कर लो। अब तुम्हें यहाँ से खाने को नहीं मिलेगा।" महाराजजी ने विनोद में उसे बहुत डाँटा। दूसरे दिन सूर्योदय होते-होते एक जमींदार देवीदयाल कुर्मी एक मन चना लेकर आश्रम आया। महाराजजी ने कुतूहलवश पूछा, "क्यों जमींदार! इतने सवेरे कैसे आना हुआ?" उसने पूछा, "महाराजजी! यहाँ कोई ब्रह्मचारी बन्दर रहता है?" महाराजजी ने कहा, "रहता तो है किन्तु तू कैसे जानता है?" वह कहने लगा, "महाराजजी! मैं गहरी नींद में सोया था। रात्रि के लगभग दो बजे ऐसा लगा, जैसे मुझे कोई झकझोर कर जगा रहा हो। मुझे आवाज भी सुनाई पड़ी-- सोता क्या है! चलो उठो, मैं अनुसुइया का ब्रह्मचारी वानर हूँ। मेरे लिए चना लेकर चलो। मैं घबड़ाकर खड़ा हो गया। मैंने चारो ओर देखा कि किसने मुझे झकझोरा? मैंने आवाज भी लगायी, कौन है? किन्तु उत्तर न पाकर पुनः सो गया। तब तक किसी ने एक झापड़ मारा। उसी कइ साथ शब्द भी सुनाई पड़ा- अभी सो रहा है, सुनाई नहीं पड़ता। मैंने जागकर विचार किया कि कदाचित अब सोया तो यह बन्दर कहीं मेरी गर्दन ही दबा न दे। इसके पश्चात उसी समय आदेश का पालन करने हेतु चना लेकर आया हूँ। वह बन्दर है कहाँ?" महाराजजी ने उस भक्त को आश्वस्त किया और कहा, "बैठो! अब उसके आने का समय हो गया है।" तब तक वह बन्दर पहाड़ से नीचे उतरकर महाराजजी के समक्ष आकर बैठ गया। महाराजजी ने कहा, "यही है ब्रह्मचारी बन्दर! कल मैंने इसे फटकारा था कि साधु हो तो अपने भोजन का भी प्रबन्ध कर लो। यह है तो बन्दर योनि में, किन्तु आचरण संतों-जैसे हैं, इसीलिए तुम्हारे हृदय में प्रेरणा हुई। यह ब्रह्मचारी है। अच्छा बेटा ब्रह्मचारी! अब तुम्हें चेताने की आवश्यकता नहीं है, तू केवल भजन करता रह, खाना मिलेगा। तू असली साधु है।" फिर भी वह भक्त नियमित मंगलवार के दिन बन्दरों के लिए चना लाने लगा। वह बन्दर ब्रह्मचारीजी से बहुत घुलमिल गया था। जब उन्हें धारकुण्डी निवास करने का आदेश हुआ तो वह बन्दर भी वहाँ से साठ किलोमीटर दूर धारकुण्डी में दिखाई पड़ा। स्वामीजी उसे देखकर बड़े ही खुश हुए, "अरे ब्रह्मचारी! महाराजजी ने हमें यहाँ भेजा तो तू भी चला आया। ठीक है, तू भी यहीं रह।" तीन दिन तक तो वह वहीं रहा किन्तु विरक्तों की तरह संभवतः निराधार विचरण में बढ़ चला। इस प्रकार जिस किसी जीवधारी का स्पर्श या संसर्ग महापुरुष से हो जाता है या वह महापुरुष ही जिसमें रूचि ले लेते हैं, वह भी पुण्यात्मा बन जाता है।Posted at 15 Nov 2018 by admin
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