जयती जयती जग-निवास , भैरव सुखकारी।। अजर अमर अज अरूप, सत चित आन भैरवजी की आरती
 
|| भैरवजी की आरती ||
जयती जयती जग-निवास , भैरव सुखकारी।।

अजर अमर अज अरूप, सत चित आनन्द रूप।
व्यापक ब्रह्मस्वरूप, प्रभु! भव भय हरी।।

शोभित बिधुवाल भाल, सुरसरिमय जटाजाल।
तीन नयन अति विशाल, मदन-दहन-कारी।।

भक्तहेतु धरत शूल, करत कठिन शूल फूल।
हित की सब हरत हूल, अचल शान्तिकारी।।

अमल अरुण चरण कमल, सफल करत काम सकल।
भक्ति मुक्ति देत विमल, माया भ्रम टारी।।

भूषण तन भुति ब्याल, मुण्डमाल कर कपाल।
रक्तवर्ण, त्रिशूल हाथ, डमरू कर धारी।।

अशरण जन नित्य शरण, बटुकदेव आर्ति हरण।
सब विधि कल्याण करण, जय त्रिपुरारी।।
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