॥ श्री गणेशाय नमः ॥ महाकाल विश्वनाथ के कोतवाल महान, कृपा करो श्री कालभैरव चालिसा
 
|| श्री कालभैरव चालिसा ||
॥ श्री गणेशाय नमः ॥

महाकाल विश्वनाथ के कोतवाल महान,
कृपा करो मुझ दास पर अपना बालक जान।
चरण-रज को देय के पावन कीजिये गात,
चाहु अपने शीश पर सदा आपका हाथ॥

जय भैरव जय भीम कपाली। जय धरणीधर अंतरयामी॥1॥

भूतनाथ जय जय डमरुधर। जय अनंत जय जय दिगम्बर॥2॥

शिप्रा गंगा कल-कल बहती। जन जन के पापों को हरती॥3॥

महाकाल विश्वनाथ निराले। तट पर बैठे भस्म रमाके॥4॥

एक समय सब देव विचारे। आपत दैत्य के भय के मारे॥5॥

महादेव शिव अंतरयामी। उनकी शरण चले मन लायी॥6॥

शिव ने अभय सभी को दिन्हा। तेज सभी का एक है किन्हा॥7॥

तेजपुञ्ज से बटुक बनाया। कालभैरव नाम धराया॥8॥

जय शिव-रुप रुद्र-अवतारा। काटो बन्धन करो भव पारा॥9॥

दो भुज चार अष्ट भुज सोहे। दस भुज सबके मन को मोहे॥10॥

हाथ त्रिशूल अरु खड़ग विराजे। पाँव मे जिनके घुँघरु बाजे॥11॥

कमल मेखला मुँज की सोहे। सारे जग को पल मे मोहे॥12॥

सात्विक रुप श्वेत है वरना। साधक के सब दुःख को हरना॥13॥

उदित सुर्य सा राजसि वेषा। ध्वजा हाथ मे अद्भुत वेगा॥14॥

रुप राजसि नित उठ ध्वावे। सकल सिद्धी मनोरथ पावे॥15॥

कृष्ण वर्ण दिगम्बर देहा। तामस रुप रक्त है नयना॥16॥

खड़ग पाश और नाग विराजे। हाथ मे जिनके डमरु बाजे॥17॥

मुण्डमाल को धारण करते। शत्रु संहार अभय कर देते॥18॥

अष्टरुप भैरव ने बनाये। एक से एक है सभी सवाये॥19॥

हर अष्टमी को पूजे जाते। बाटी चुरमा भोग लगाते॥20॥

रुप चतुर्भुज अति ही सुहाना। गदा शूल मुग्दल अरु पाशा॥21॥

अष्टभुजा का रुप बनाते, चक्र त्रिशूल कृपाण नचाते॥22॥

पाश शूल दण्ड धनु फरसा। त्रिलोकी मे बम बम गरजा॥23॥

बं बं बं बं बटुक कहाते। मोर पँख का चँवर डुलाते॥24॥

दश भुज रुप अजब निराला। सिर पर जटा मुकुट बलवाना॥25॥

गदा त्रिशूल चक्र अरु दण्डा। धनुष बाण परशु और मुण्डा॥26॥

अभय मुद्रा निर्भय करती। भक्तों के सब दुःख को हरती॥27॥

व्याघ्र चर्म को धारण करते। सारे जग कि पिड़ा हरते॥28॥

तुम अविनाशी त्र्यम्बक देवा। कालजयी शिव दिगम्बर वेशा॥29॥

क्रोधवन्त नकुलेश कहाते। चण्ड प्रचण्ड रुप बनाते॥30॥

"पञ्च मकार" से पुजे जाते। नित मदिरा का भोग लगाते॥31॥

चौसठ योगिनी इनके संगा। जटाजुट पर सोहे चन्दा॥32॥

कालभैरव कोतवाल कहाते। नित खिर का भोग लगाते॥33॥

खुद स्वामी सेवक खुद हि के। कालजयी महाकाल मही के॥34॥

वाहन श्वान नुकीले दन्ता। भूतनाथ भैरव बलवन्ता॥35॥

तुक कैलाशी शिव के रुपा। अश्वनाथ तुम्ह सा नहीं दुजा॥36॥

भुतो के तुम नाथ कहाओ। पशुपति भिक्षुक वेश बनाओ॥37॥

तुम्ही भूत भविष्य के स्वामी। वर्तमान मे ओढरदानी॥38॥

अष्ट सिद्धी नव निधी के दाता। पूरन ब्रह्म प्रसिद्ध अकामा॥39॥

जय जय भैरव भय के भंजक। कृपानिधी मुझ पर॥40॥

जो यह पढे कालभैरव चालिसा,
होय सिद्धी साखी शिवसुत सा॥

काल समय का रुप है इसके नाम अनेक,
काल से जो निर्भय करे कालभैरव ही होय।
कालभैरव कि कृपा शिवा-शंकर उपकार,
वाक्य पुष्प यह श्याम का होवे प्रभु स्वीकार॥
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