॥मंगलाचरण॥विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय,लम्बोदराय सकलाय dainikpooja1
 
|| घर में पूजन विधि ||
॥मंगलाचरण॥

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय,
लम्बोदराय सकलाय जगत्‌ हिताय।
नागाननाय श्रुति-यज्ञ-भूषिताय,
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥

गंगा तरंग रमणीय जटाकलापं,
गौरि निरन्तर विभूषित वामभागं॥

नारायण प्रिय मनंग मदापहारम,
वाराणसी पुरपतिम् भज विश्वनाथं॥

॥घर में पूजन॥

वैसे तो पूजा किसी वेदपाठी ब्राह्मण से ही करानी चाहिए लेकिन यदि कोई वेदपाठी उपलब्ध नहीं है तो ऐसी स्थिति में आप स्वयं भी पूजा कर सकते हैं.

पूजा की जो विधि हम बताने जा रहे हैं वह पूर्ण नहीं है. इसे कामचलाउ ही कहा जा सकता है. बिलकुल नहीं से कुछ होना अच्छा होता है.

हम यह विधि इसलिए बता रहे हैं क्योंकि यदि मन में पूजा का विचार आया है तो उसे पुरोहित के अभाव में रोकना नहीं चाहिए. त्रुटियों के लिए ईश्वर क्षमा करें.


॥पवित्रीकरण॥

सबसे पहले निम्न पावित्रीकरण मंत्र पढ़ते हुए आसन और स्वयं को पवित्र कर लेना चाहिए. मंत्र को पढ़ते हुए पुष्प से तीन बार जल स्वयं पर और आसन पर छिड़कें:

ऊँ अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा।य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥

॥आचमन॥

पवित्र होने के बाद आचमन करना चाहिए. आचमन के लिए थोड़ा जल हथेली में लेकर पीते हुए आचमन मंत्र बोलना चाहिए:

ऊँ केशवाय नम:, ऊँ माधवाय नम:, ऊँ नारायणाय नम:,
(आचमन के बाद हाथ धो लेना चाहिए.)

॥चंदन लगाना॥

अनामिका उंगली यानी रिंग फिंगर से ललाट पर चंदन लगाते समय यह मंत्र पढ़ें:

चन्दतनस्य. महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम् आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।


॥संकल्प॥

कोई पूजा बिना संकल्प लिए पूर्ण नहीं होती. हाथ में तिल, फूल, अक्षत, मिठाई और फल आदि लेकर निम्न मंत्र के साथ संकल्प लें:

यथा उपलब्ध पूजन सामग्रीभिः (जिस भगवान की पूजा है उनका नाम लें जैसे सरस्वती पूजा के लिए भगवत्या: सरस्वत्याः या गणेश पूजा के लिए श्रीगणपतिः ) पूजनम् अहं करिष्ये

(जो भी उपलब्ध पूजन साधन-सामग्री उपलब्ध है उससे हे देव/माता मैं आपकी पूजा करता हूं.)

॥मंगलाचरण व गौरी-गणेश पूजा॥

इसके बाद प्रत्येक पूजन में प्रथम आराध्य भगवान गणपति की पूजा करें.
गणपति पूजनः प्रत्येक पूजा में सबसे पहले गणपति पूजा होती है. मंगलाचरण से गणपति की पूजा आरंभ कर सकते हैं.

हाथ में फूल लें और गणपति का ध्यान इस मंत्र से करें.

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय,
लम्बोदराय सकलाय जगत्‌ हिताय।
नागाननाय श्रुति-यज्ञ-भूषिताय,
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

गणेशजी को अक्षत, दूर्वा, जल, लाल चंदन, सिंदूर, फल-फूल, मेवा आदि समर्पित करें. तुलसी बिलकुल न चढ़ाएं.

॥चंदन/सिंदूर/दूर्वा/बिल्वपत्र आदि अर्पित करने का मंत्र॥

इदम् रक्त चंदनम् समर्पयामि ऊँ गं गणपतये नमः

इसी प्रकार सिन्दूर के लिए "इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊँ गं गणपतये नम:

दूर्वा और विल्बपत्र फल-फूल आदि चढ़ाते समय एक ही मंत्र है. उसमें केवल वस्तु का नाम बदलना होता है. जैसे गणेश जी को वस्त्र पहनाते समय वस्त्र का यह मंत्र बोलें.

इदं पीत वस्त्रं ऊँ गं गणपतये समर्पयामि।

॥फूल चढ़ाने के लिए॥

इदं पुष्पं ऊँ गं गणपतये समर्पयामि.


॥फल चढ़ाने के लिए॥

इदं फलं ऊँ गं गणपत्ये समर्पयामि.

मिष्ठान्न के लिए:

इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊँ गं गणपतये समर्पयामि:।

॥आचमन॥

जैसे हम भोजन के बाद हाथ धोते हैं वैसे ही प्रसाद चढ़ाने के बाद भगवान को आचमन जरूर कराना चाहिए. फूल या पल्लव से जल छिड़कते हुए यह मंत्र पढ़ें.

इदं आचमनयं ऊँ गं गणपतये नम:

॥मुखशुद्धि॥

पान-सुपारी से निम्न मंत्र पढ़कर मुखशुद्धि करानी चाहिए.

इदं ताम्बूल पुगीफलं समायुक्तं ऊँ गं गणपतये समर्पयामि:

॥नवग्रह आराधना॥

जिस तरह से गणपति की पूजा हुई है, नवग्रहों की पूजा का भी वही विधान है. परंतु यदि समय का अभाव है तो नवग्रह मंत्र पढ़कर उनसे त्रुटियों को क्षमा कर कल्याण की याचना कर लें.

ब्रह्मा मुरारीस्त्रिपुरांतकारी
भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः
सर्वेग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु।।


॥कलश पूजन॥

पूजा में कलश पूजन का महत्व है. घरों में होने वाली पूजा में आमतौर पर लोग कलश पूजन नहीं कर पाते, लेकिन जो लोग कलश पूजन करना चाहते हों वे समझ लें. घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें. कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत और सिक्के रखें. कलश के गले में मोली लपेटें. नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें. हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरूण देवता का निम्न मंत्र से कलश में आह्वान करें.

ऒ३म् तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्त दाशास्ते यजमानो हविर्भिः।
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:।

अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ऒ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥

इसके बाद वरूण और इन्द्र देवता को जल, अक्षत, फल-फूल, मेवा आदि चढ़ाकर उनकी स्तुति करनी चाहिए.

इसके बाद कथा-पूजा आरंभ करना चाहिए. जैसे यदि आप सरस्वती माता की पूजा कर रहे हैं तो माता सरस्वती का ध्यान कर स्तुति करें.


॥आराध्य के स्नान का मंत्र॥

ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।।

।।इति संपूर्णंम्।।
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