जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।भक्तजनों के संकट, छन में दूर आरतीः जय जगदीश हरे
 
|| आरतीः जय जगदीश हरे ||
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, छन में दूर करे॥जय..

जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका।
सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥जय..

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ जय..

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ जय..

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मुरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ जय..
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ जय..

दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाऒ, द्वार पडा तेरे॥ जय..

विषय विकार मिटाऒ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढाऒ, संतन की सेवा॥ जय..

जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।।
भक्तजनों के संकट,दासजनों के संकट क्षण में दूर करे।।

।।इति संपूर्णंम्।।
FACEBOOK COMMENTES
    Share it --