शास्त्रों में 32 प्रकार के सेवापराधों का उल्लेख मिलता है। यदि श्री नारायण कवचम्
 
|| श्री नारायण कवचम् ||
शास्त्रों में 32 प्रकार के सेवापराधों का उल्लेख मिलता है। यदि 'नारायण कवच' करते समय इन 32 सेवापराधों से सावधानी बरतें तो ईश्वर उनकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं।

श्रीमद्भागवत के अध्याय आठ में नारायण कवच के संबंध में न्यास व कवच पाठ हेतु बताया गया है कि भगवान श्री हरि गरुड़ की पीठ पर अपने चरण-कमल रखे हुए हैं। अणिमादि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं।

संक्षिप्त नारायण कवच
आठ हाथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण धनुष और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं। 'वे ही ऊँकारस्वरूप प्रभु सब प्रकार से, सब ओर से, मत्स्य मूर्ति भगवान जल के भीतर जल जंतुओं से और वरुण के पाश से, वामन भगवान स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रम भगवान आकाश में, भगवान नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में, अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को धारण करने वाले यज्ञ मूर्ति वराह भगवान मार्ग में, परशुरामजी पर्वतों के शिखरों पर और लक्ष्मणजी के सहित भगवान रामचंद्रजी प्रवास के समय, भगवान नारायण मारण, मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से, ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान दत्तात्रय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान कपिल कर्मबंधनों से, परमर्षि सनतकुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद 'सेवापराधों' से, भगवान कच्छप सब प्रकार के नरकों से, भगवान धनवंतरिकुपथ्य से, जितेंद्रिय भगवान ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वंद्वों में, यज्ञ भगवान लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्री शेषजी विषैले एवं क्रोधी साँपों से, भगवान श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास की अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखंडियों से और प्रमाद से, भगवान कल्कि पाप बहुल कलिकाल के दोषों से, प्रातःकाल भगवान केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ आने पर भगवान गोविन्द अपनी बाँसुरी लेकर, दोपहर को भगवान विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर और दोपहर के बाद भगवान मधुसूदन अपना धनुष लेकर, सायंकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद ऋषीकेश, अर्धरात्रि के समय तथा उसके पूर्व अकेले भगवान पद्मनाभ, रात्रि के पिछले प्रहर में श्री वत्सलाञ्छन हरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्री दामोदर और सम्पूर्ण संध्याओं में कालमूर्ति भगवान विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें।'

उपरोक्त कवच में देवर्षि नारद 'सेवापराधों' से रक्षा करने के संबंध में शास्त्र में बत्तीस प्रकार के सेवापराध माने गए हैं।

01. सवारी पर चढ़कर अथवा पैरों में खड़ाऊ पहनकर श्रीभगवान के मंदिर में जाना।
02. रथयात्रा, जन्माष्टमी आदि उत्सवों का न करना या उनके दर्शन न करना।
03. श्रीमूर्ति के दर्शन करके प्रणाम न करना।
04. अशौच-अवस्था में दर्शन करना।
05. एक हाथ से प्रणाम करना।
06. परिक्रमा करते समय भगवान के सामने आकर कुछ देर न रुककर फिर परिक्रमा करना अथवा केवल सामने ही परिक्रमा करते रहना।
07. श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने पैर पसारकर बैठना।
08. दोनों घुटनों को ऊँचा करके उनको हाथों से लपेटकर बैठ जाना।
09. मूर्ति के समक्ष सो जाना।
10. पूजन के समय अथवा मंदिर आदि में भोजन करना।
11. झूठ बोलना।
12. श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने जोर से बोलना।
13. आपस में बातचीत करना।
14. मूर्ति के सामने चिल्लाना।
15. कलह करना।
16. किसी को पीड़ा देना।
17. किसी पर अनुग्रह करना।
18. निष्ठुर वचन बोलना।
19. कम्बल से सारा शरीर ढँक लेना।
20. दूसरों की निन्दा करना।
21. दूसरों की स्तुति करना।
22. अश्लील शब्द बोलना।
23. अधोवायु का त्याग करना।
24. शक्ति रहते हुए भी गौण अर्थात सामान्य उपचारों से भगवान की सेवा पूजा करना।
25. श्री भगवान को निवेदित किए बिना किसी भी वस्तु का खाना-पीना।
26. जिस ऋतु में जो फल हो, उसे सबसे पहले श्री भगवान को न चढ़ाना।
27. किसी शाक या फलादि के अगले भाग को तोड़कर भगवान के व्यंजनादि के लिए देना।
28. श्री भगवान के श्रीविग्रह को पीठ देकर बैठना।
29. श्री भगवान के श्रीविग्रह के सामने दूसरे किसी को भी प्रणाम करना।
30. गुरुदेव की अभ्यर्थना, कुशल-प्रश्न और उनका स्तवन न करना।
31. अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना।
32. किसी भी देवता की निंदा करना।

भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए। कवच शुद्ध व विधिपूर्वक किया जाना चाहिए।

।। श्री नारायण कवच ।।
न्यास
सबसे पहले श्री गणेश तथा भगवान नारायण को नमस्कार करके निम्नलिखित मंत्रो से न्यास करें।
अङ्गन्यास -
ॐ नमः पादयोः
दाहिने हाथ की तर्जनी व् अंगूठे को मिलाकर दोनों पैरो को स्पर्श करें।
ॐ नं नमः जानुनो:
दाहिने हाथ की तर्जनी व् अंगूठे को मिलाकर दोनों घुटनों को स्पर्श करें।
ॐ मों नमः उर्वो:
दाहिने हाथ की तर्जनी व् अंगूठे को मिलाकर दोनों जांघों को स्पर्श करें।
ॐ नां नमः उदरे
दाहिने हाथ की तर्जनी व् अंगूठे को मिलाकर पेट का स्पर्श करें।
ॐ रां नमः हृदि
मध्यमा, अनामिका और तर्जनी से हृदय का स्पर्श करें।
ॐ यं नमः उरसि
मध्यमा, अनामिका और तर्जनी से छाती का स्पर्श करें।
ॐ णां नमः मुखे
तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर मुख का स्पर्श करें।
ॐ यं नमः शिरसि
तर्जनी और मध्यमा को मिलाकर सिर का स्पर्श करें।
करन्यास
ॐ ॐ नमः दक्षिणतर्जन्याम्
दाहिने अंगूठे दहिनी तर्जनी के सिरे का स्पर्श करें।
ॐ नं नमः दक्षिणमध्यमाभ्याम्
दाहिने अंगूठे से दाहिने हाथ की मध्यमा का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ मों नमः दक्षिणानामिकाभ्याम्
दाहिने अंगूठे से दाहिने हाथ की अनामिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ भं नमः दक्षिणकनिष्ठिकाभ्याम्
दाहिने अंगूठे से दाहिने हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ गं नमः वामकनिष्ठिकाभ्याम्
बाएँ अंगूठे से बाएँ हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ वं नमः वामानामिकाभ्याम्
बाएँ अंगूठे से बाएँ हाथ की अनामिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ तें नमः वाममध्यमाभ्याम्
बाएँ अंगूठे से बाएँ हाथ की मध्यमा का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ वां नमः वामतर्जन्याम्
बाएँ अंगूठे से बाएँ हाथ की तर्जनी का ऊपर वाला पोर स्पर्श करें।
ॐ सुं नमः दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणी
दाहिने हाथ की चारों अंगुलियों से दाहिने हाथ के अंगूठे का ऊपर वाला पोर छुए।
ॐ दें नमः दक्षिणाङ्गुष्ठाध: पर्वणी
दाहिने हाथ की चारों अंगुलियों से दाहिने हाथ के अंगूठे का नीचे वाला पोर छुए।
ॐ वां नमः वामाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणी
बाए हाथ की चारों अंगुलियों से बाए हाथ के अंगूठे का ऊपर वाला पोर छुए।
ॐ यं नमः वामाङ्गुष्ठाध: पर्वणी
बाएं हाथ की चारों अंगुलियों से बाएं हाथ के अंगूठे का नीचे वाला पोर छुए।
विष्णु षडाक्षरन्यास
ॐ नमः हृदये
तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से हृदय का स्पर्श करें।
ॐ विं नमः मुर्धनि
तर्जनी और मध्यमा के संयोग से सिर का स्पर्श करें।
ॐ षं नमः भ्रुवोर्मध्ये
तर्जनी और मध्यमा से दोनों भोहों का स्पर्श करें।
ॐ णं नमः शिखायाम्
अंगूठे से शिखा का स्पर्श करें।
ॐ वें नमः नेत्रयोः
तर्जनी और मध्यमा से दोनों नेत्रों का स्पर्श करें।
ॐ नं नमः सर्वसंधिषु
तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से शरीर के सभी जोड़ो - जैसे कन्धा, कोहनी, घुटना आदि का स्पर्श करें।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम्
पूर्व की ओर चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् आग्नेयाम्
आग्नेयकोण में चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम्
दक्षिण की ओर चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् नैर्ऋत्ये
नैर्ऋत्यकोण में चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्रतिच्याम्
पश्चिम की ओर चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्ये
वाव्यम् कोण में चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् उदीच्याम्
उत्तर की ओर चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऐशान्याम्
ईशानकोण में चुटकी बजाए।
ॐ मः अस्त्राय फट् उर्ध्वायाम्
ऊपर की ओर चुटकी बजाए।
ॐ अस्त्राय फट् अधरायाम्
नीचे की ओर चुटकी बजाए।

अथ कवचम्

राजोवाच
यया गुप्त: सहस्त्राक्ष: सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्याबुभुजे श्रियम्।।
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणयात्मकम्।
यथाऽऽततायिन: शत्रुन्येनगुप्तोऽजयन्मृधे।।
राजा परीक्षित ने पूछा -हे भगवन! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओ की चतुरंगिणी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीतकर त्रिलोकी के वैभव का उपभोग किया , आप उस नारायण कवच को मुझे सुनाइए और यह भी बतलाइये की उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की।
शुकोवाच
वृत: पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।
शुकदेवजी ने कहा- परीक्षित! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इंद्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने उन्हें नारायण कवच का उपदेश किया। तुम एकाग्रभाव से उसका श्रवण करो।
विश्वरूपोवाच
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यत: शुचि:।।
विश्वरूप ने कहा- देवराज इंद्र! भय का अवसर होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर् लेनी चाहिए।
नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरुर्वोरुदरे हृद्यथोरसी।।
उसकी विधि यह है कि पहले हाथ पैर धोकर आचमन करें, फिर हाथ में कुश की पवित्री धारण करके उत्तराभिमुख बैठ जाए। इसके बाद कवच धारण करने तक और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से 'ॐ नमो नारायणाय' और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्रों के द्वारा हृदयादि अंगन्यास तथा अंगुष्ठादि करण्यास करें।
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादिनी विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।
पहले 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ आदि अक्षरों का क्रमशः पैरों, घुटनों, जांघो, पेट, हृदय, वक्ष:स्थल, मुख और सिर में न्यास करें। अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के 'य' कार से लेकर 'ॐ' कार पर्यन्त आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ कर उन्हीं आठ अंगों में विपरीत क्रम से न्यास करे।
करन्यास तत: कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादीय कारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्र के ण् आदि बारह अक्षरों का दाईं तर्जनी से बाईं तर्जनी तक दोनों हाथ की आठ अंगुलियों और दोनों अंगूठो की दो-दो गांठो में न्यास करें।
न्यसेद्ध्दय ओङ्कारं विकारमनु मुर्धनि।
षकारं तु भ्रूवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।
'ॐ विष्णवे नमः' इस मंत्र के पहले अक्षर 'ॐ' का हृदय में, 'वि' का ब्रह्मरन्ध्र में, 'ष' का भोहों के बीच में, 'ण' का चोटी में न्यास करें।
वेकारं नेत्रयोर्यूञ्ज्यान्नकारं सर्वसंधिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।
सविसर्ग फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति।।
आत्मानं परमं ध्यायेद् ध्येयं षट्शक्तिभिर्यूतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत्।।
तदन्तर वे का दोनो में और न का शरीर के जोड़ो में न्यास करें। फिर 'ॐ मः अस्त्राय फट्' का उच्चारण कर दिग्बन्ध करें। इस प्रकार न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरुष मन्त्र स्वरूप हो जाता है। इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान का ध्यान करें और स्वयं का भी उसी रूप में ही चिंतन करें। तत्पश्चात विद्या, तेज और तप-स्वरूप इस कवच का पाठ करें।
ॐ हरिर्वीदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्म: पतगेंद्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापपाषान् दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहु:।।
भगवान श्री हरि विष्णु गरुड़ की पीठ पर अपने चरण कमल रखे हुए है । अणिमादि आठो सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही है। आठ हाथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश (फंदा) धारण किये हुए हैं। वे ही ॐ कार स्वरूप प्रभु सब ओर से मेरी रक्षा करे।
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोर्गणेभ्यो वरुणस्यु पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः।।
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभु: पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारि:।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भा:।।
मत्स्यमूर्ति भगवान जल के भीतर जल-जंतु और और वरुण के पाश से मेरी रक्षा करे। माया से ब्रह्मचारी का रूप धारण करने वाले वामन भगवान स्थल पर और विश्व रूप श्री त्रिविक्रम भगवान आकाश में मेरी रक्षा करें। जिनके घोर अट्टहास से सब दिशाएं गूंज उठती थी और गर्भवती दैत्य-पत्नियों के गर्भ गिर गए थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान नृसिंह जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें।
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्प: स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराह:।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोव्याद् भरताग्रजोऽस्मान्।।
अपनी डाढ़ो पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान मार्ग में, परशुरामजी पर्वतों के शिखरों पर और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगवान रामचन्द्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें।
मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायण: पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथ: पायाद् गुणेश: कपिल: कर्मबन्धात्।।
भगवान नारायण मारण-मोहन आदि भयंकर अभिचारो और सब प्रकार के प्रमादो से मेरी रक्षा करें। ऋषिश्रेष्ठ नर वर्ग से, योगेश्वर भगवान दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान कपिल कर्मबन्धनों से मेरी रक्षा करें।
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाध्दयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्य: पुरुषार्चानान्तरात् कुर्मो हरिर्मा निरयादशेषात्।।
परम् ऋषि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार न् करने के आपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवन कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें।
धनवन्तरीर्भगावान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयाद्षभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्र:।।
धन्वन्तरि कुपथ्य से, ऋषभदेव सूख-दुःख आदि भयदायक द्वंद्वो से, यज्ञ भगवान लोकापवादो से, बलराम मनुष्यकृत कष्टो से और श्री शेषजी क्रोधवशाद नामक सर्पो से मेरी रक्षा करें।
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्कि: कले: कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरुकृतावतार:।।
भगवाब श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों और प्रमाद से मेरी रक्षा करें। धर्मरक्षा के लिए महान अवतार धारण करने वाले भगवान कल्कि पापबहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें।
मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणूः।
नारायण: प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यंदिने विष्णूररीन्द्रपाणीः।।
प्रातः काल भगवान केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें।
देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उत्तरार्ध्दे निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः।।
तीसरे पहर में भगवान मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें। सायंकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्धरात्रि के समय अकेले भगवान पद्मनाभ मेरी रक्षा करें।
श्रीवत्सधाममापररात्र ईशः प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसंध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान कालमूर्तिः।।
रात्रि के पिछले पहर में श्री श्रीवत्स भगवान श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण संध्याओं में कालमूर्ति भगवान विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें।
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमी भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दंदग्धि दंदग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखॊ हुताशः।।
सुदर्शन! आपका आकार चक्र (रथ के पहिए) की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलयंकारी अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते है। जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घासफूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को जला दीजिये।
गदेऽशनिस्पर्शन विस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्ड वैनायक यक्षरक्षो भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन्।।
कौमोदकी गदा! आपसे छूटने वाली चिंगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है। आप भगवान अजित की प्रिया है और मै उनका सेवक हूँ। इसलिए आप कुष्मांड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भुत और प्रेतादि ग्रहों की अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर-चूर कर दीजिये।
त्वंयातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहवोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन्।।
शंख श्रेष्ठ! आप भगवान श्रीकृष्ण के फुकने से भयंकर शब्द करके शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावह प्राणियों को यहाँ से झटपट भगा दीजिये।
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चक्षुंषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्वीषामघोनां हर पापचक्षूषम्।।
भगवान की श्रेष्ठ तलवार! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है। आप भगवान की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दीजिए। भगवान की प्यारी ढाल! आप में सैकड़ो चन्द्राकार मण्डल है। आप पापात्मा शत्रुओं की आँखे बंद कर दीजिए और उन्हें सदा के लिए अँधा बना दीजिये।
यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतूभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा।।
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः।।
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जंतु, दाढ़ो वाले हिंसक पशु, भुत प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमे जो जो भय हो और जो जो हमारे लिए अमंगलकारी हो, वे सभी भगवान के नाम, रूप तथा आयुधों का वर्णन करने से तत्काल नष्ट हो जाये।
गरूडो भगवान स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभु:।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः।।
वृहत, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिंकु स्तूति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान गरुड़ और विश्वक्सेन अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः।।
श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि, इंद्रिय, मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचाए।
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः।।
जितना भी कार्य अथवा कारणरूप जगत है, वह वास्तव में भगवान ही है- इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जाये।
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुधलिङ्गख्या धत्ते शक्तिः स्वमायया।।
जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके है, उनकी दृष्टि में भगवान का स्वरूप समस्त विकल्पों व् भेदों से रहित है। फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते है।
तैनव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान हरिः।
पातु सर्वेः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः।।
यह बात निश्चित रूप से सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ सर्वव्यापक भगवान श्रीहरि सदा सर्वत्र सब स्वरूपो से हमारी रक्षा करें।
विदुक्षु दिक्षुर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयंल्लोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः।।
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोकों के भय को भगा देते है और जो अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते है, वे भगवान नृसिंह दिशा-विदिशा में, नीचे-ऊपर, बाहर-भीतर सब ओर हमारी रक्षा करें।
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसूरयूथपान्।।
देवराज इंद्र! मैंने तुम्हे यह नारायण कवच सुना दिया। इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो। बस फिर तुम अनायास ही दैत्य योद्धाओ को जीत लोगे।
एतद् धारयमाणस्तू य यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते।।
इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरुष जिसको भी देख लेता है अथवा पैर से ही छू लेता है, वह तत्काल भय से मुक्त हो जाता हैं।
न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित्।।
जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाचादि और बाघ आदि हिंसक जीवों से किसी प्रकार का भय नहीं होता।
इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्ग जहौ समरूधन्वनि।।
देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक गौत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योग धारणा से अपना शरीर मरुभूमि में त्याग दिया।
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथ: स्त्रीर्भिवृतो यत्रद्विजक्षयः।।
जहां उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था , उसके ऊपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठकर निकले।
गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यावाक्शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचिसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात्।।
वहां आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े। इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न् रही जब उन्हें वालखिल्य मुनियों ने बतलाया की यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देवता की हड्डियों को लेजाकर पूर्व वाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गए।
शुकोवाच
य इदं श्रृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात्।।
श्री शुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित! जो पुरुष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदरपूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते है और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है।
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मी बुभूजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान्।।
परीक्षित! शतक्रतु इंद्र ने आचार्य विश्वरूप से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जित लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे।
।। इति श्री श्रीमद्भागवते महापुराणे षष्ठ स्कंधऽष्टमे अध्याये श्रीनारायण कवचम् ।।
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