पांडुपोल हनुमान मंदिर अलवर, राजस्थान में स्थित है। इस मन्दिर में हनुमान जी की लेटी हुई मुद्रा ह.....
 
पांडुपोल हनुमान मंदिर, अलवर(राजस्थान)
पांडुपोल हनुमान मंदिर अलवर, राजस्थान में स्थित है। इस मन्दिर में हनुमान जी की लेटी हुई मुद्रा हैं। पौराणिक और ऐतिहासिक प्रदेश राजस्थान के सिंहद्वार के नाम से पहचाने जाने वाले अलवर शहर से 55 कि.मी. की दूरी पर स्थित है पांडुपोल हनुमान मंदिर। प्रसिद्ध वन्यजीव अभ्यारण्य सरिस्का के सुरम्य वातावरण और हरियाली से आच्छादित अरावली की पहाडि़यों में स्थित पांडुपोल हनुमान मंदिर का इतिहास महाभारत से जुड़ा हुआ है।

प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक अज्ञातवास के दौरान जब पांडव अपनी मां कुंती के साथ वन-वन की खाक छान रहे थे, उस समय ये लोग घूमते-घूमते अलवर के इस वन्य क्षेत्र में आ गए थे। बताया जाता है कि पांडवों के विचरण के दौरान एक स्थान ऐसा आया जहां से आगे जाने का कोई रास्ता नहीं था। तब महाबली भीम ने रास्ते में खड़ी विशालकाय चट्टान को अपनी गदा के प्रहार से चकनाचूर कर रास्ता बनाया था। इस घटना से प्रभावित होकर भीम के भाइयों और माता ने उनके बल की खूब प्रशंसा की। इस प्रशंसा से भीम में कुछ घमंड आ गया था। आगे चलकर पांडवों को रास्ते में एक विशालकाय बूढ़ा वानर लेटा हुआ मिला। भीम ने उस वानर को वहां से उठकर कहीं और विश्राम करने के लिए कहा। तब उस वानर ने कहा कि मैं बुढ़ापे के कारण हिल-डुल नहीं सकता तुम लोग दूसरे रास्ते से आगे बढ़ जाओ। लेकिन अपने बल के मद में चूर भीम को वानर की यह बात अच्छी नहीं लगी और वे उस वानर को वहां से हटाकर दूर करने के लिए आगे आए। कहा जाता है कि शरीर तो दूर भीम उस वानर की पूंछ तक को नहीं हिला सके। काफी प्रयासों के बावजूद जब वानर टस से मस नहीं हुआ तो भीम ने लज्जित होकर उससे अपनी गर्व भरी बातों के लिए क्षमायाचना की। तब वह वानर अपने असली रूप में आया। वह वानर स्वयं हनुमान जी थे। हनुमान जी ने प्रकट होकर भीम को महाबली होने का वरदान दिया व उन्हें कभी अभिमान न करने की सलाह भी दी।

बाद में संत निर्भयदास महाराज ने यहां पर हनुमान जी के मंदिर का निर्माण करवाया जिसे पांडुपोल हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर में मंगलवार और शनिवार को भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और भगवान के दर्शन कर प्रसन्न होते हैं। मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति लेटी हुई अवस्था में है। हनुमान जी की इस अवस्था की मूर्ति केवल इसी मंदिर में स्थापित है। प्रत्येक साल भादों के महीने में यहां विराट मेले का आयोजन किया जाता है। जिस स्थान पर भीम ने गदा मारी थी वह स्थान और गदा के प्रहार से चकनाचूर चट्टान आज भी वहां मौजूद है। इस चट्टान से अविरल जल की धारा बहती है, जिसे देखने भारी संख्या में लोग यहां आते हैं। मंदिर के आसपास कुदरती सौंदर्य, बहते झरने और खूबसूरत पहाडि़यां श्रद्धालुओं को खूब भाते हैं।Posted at 23 Apr 2020 by admin
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