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विद्येश्वरसंहिता: अठारहवाँ अध्याय: बन्धन और मोक्ष का विवेचन, शिव पूजा का उपदेश, लिङ्ग आदि मे शिव पूजन का विधान, भस्म के स्वरुप का निरुपण और महत्त्व, शिव एवं गुरु शब्द की व्युत्पत्ति तथा शिव के भस्मधारण का रहस्य : पृष्ठ 1  
ऋष्य ऊचुः
बंधमोक्षस्वरूपं हि ब्रूहि सर्वार्थवित्तम।
सूत उवाच
बंधमोक्षं तथोपायं वक्ष्येऽहं शृणुतादरात्॥१॥ पुनश्च कारणेशस्य षट्पञ्चाशत्तदूर्ध्वगाः॥९१॥
Posted in श्रीशिवमहापुराण at Fri, 24 Apr 2020 01:42:34 +0530 by भक्तिदर्पण

तृतीय स्कंध: बीसवाँ अध्याय: ब्रह्माजी की रची हुई अनेक प्रकार की सृष्टि का वर्णन : पृष्ठ 4 
गूहन्तीं व्रीडयात्मानं नीलालकवरुथिनीम्।
उपलभ्यासुरा धर्म सर्वे सम्मुमुहुः स्त्रियम्॥31॥
वह नीली-नीली अलकावली से सुशोभित सुकुमारी मानो लज्जा के मारे अपने अंचल में ही सिमटी जाती थी। विदुर जी! उस सुन्दरी को देखकर सब-के-सब असुर मोहित हो गये॥31॥
Posted in श्रीमद्भागवतमाहापुराण at 11 Days ago by भक्तिदर्पण

Shri DurgaSaptsati 
श्रीदुर्गासपतशती हिंन्दु धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है। इसमे भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ ही बड़े-बड़े गूढ साधन-रहस्य भरे हैं। कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मन्दाकिनी बहानेवाला यह ग्रंथ भक्तों के लिये वांछाकल्पतरु है सकाम भक्त इसके सेवन से मनोऽभिलाषित दुर्लभतम वस्तु या स्थिती को सहज ही प्राप्त कर लेते है और निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं।
Posted in Shri DurgaSaptsati

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