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विद्येश्वरसंहिता: सत्रहवाँ अध्याय: षड्​लिग्ङ्स्वरुप प्रणव तथा उसके सुक्ष्म-रुप (ॐकार) और स्थुल-रुप (पञ्चाक्षर-मन्त्र) का विवेचन : पृष्ठ 10  
पुनःकारणरुद्रस्य लोकाष्टाविंशका मताः॥९१ पुनश्च कारणेशस्य षट्पञ्चाशत्तदूर्ध्वगाः॥९१॥
उनसे भी ऊपर फिर कारणरुपी रुद्र के अट्ठाईस लोकों की स्थिति मानी गयी है। फिर उनसे भी ऊपर कारणेश शिव के छप्पन लोक विद्यमान है।
Posted in श्रीशिवमहापुराण at Mon, 19 Aug 2019 13:54:02 +0530 by भक्तिदर्पण

तृतीय स्कंध: उन्निसवा अध्याय: हिरण्याक्ष वध : पृष्ठ 1 
मैत्रेय उवाच
अवधार्य विरिञ्चस्य निर्व्यलीकामृतं वचः।
प्रहस्य प्रेमगर्भेण तदपाड़्गेन सोऽग्रहीत्॥1॥
मैत्रेय जी कहते हैं — विदुर जी! ब्रह्मा जी के कपटरहित अमृतमय वचन सुनकर भगवान् ने उनके भोलेपन पर मुसकराकर अपने प्रेमपूर्ण कटाक्ष के द्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली॥1॥
Posted in श्रीमद्भागवतमाहापुराण at 9 Days ago by भक्तिदर्पण

Shri DurgaSaptsati 
श्रीदुर्गासपतशती हिंन्दु धर्म का सर्वमान्य ग्रंथ है। इसमे भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ ही बड़े-बड़े गूढ साधन-रहस्य भरे हैं। कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मन्दाकिनी बहानेवाला यह ग्रंथ भक्तों के लिये वांछाकल्पतरु है सकाम भक्त इसके सेवन से मनोऽभिलाषित दुर्लभतम वस्तु या स्थिती को सहज ही प्राप्त कर लेते है और निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं।
Posted in Shri DurgaSaptsati

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